mahabharat ke pramukh patra in hindi महाभारत के प्रमुख पात्र

mahabharat ke pramukh patra in hindi महाभारत के प्रमुख पात्र 

ऐसा कहा जाता है की महाभारत (mahabharat ke pramukh patra ) का मूल कारन पुत्र मोह था . यदि पुत्र मोह आड़े न आया होता तो महाभारत की नौबत ही न आयी होती और इतना नरसंहार न हुआ होता . तो आइये मिलते है महाभारत के तीन पुत्र-भक्तों से .

महाराज शांतनु
कौरवों और पांडवों के पूर्वज तथा भीष्म पितामह के (mahabharat ke pramukh patra ) पिता महाराज शांतनु एक महँ शासक थे . उन्होंने गंगा से ववाह किया तथा आठ पुत्रो के पिता बने परंतु गंगा ने अपने सात पुत्रो को नदी में बहा दिया . जब वे अपने आठवे (mahabharat ke pramukh patra ) पुत्र यानी देवव्रत (भीष्म ) को भी पानी में बहाना चाहा तब महाराज शांतनु ने उन्हें रोक लिया और गंगा अपने पुत्र को लेकर चली गयीं . वर्षों पश्चात एक दिन गंगा महाराज शांतनु का पुत्र उन्हें वापिस सौप देती है . महाराज शांतनु अपने पुत्र को पाकर काफी प्रसन्न हो जाते है तथा उन्हें युवराज घोषित कर देते है .
एक दिन महाराज (mahabharat ke pramukh patra )  शांतनु अपने देश के विहार पर गए थे जब उन्हें एक एक गंध बड़ी दूर से ही अपनी तरफ खींचने लगी . जब महाराज शांतनु आगे गए तो उन्हें एक ख़ूबसूरत कन्या सत्यवती एक नाव में बैठी दिखाई दी . महाराज कन्या को देखते ही उसके प्रेम में पद गए तथा हर रोज उसकी नाव में बैठ कर नदी के एक किनारे से दुसरे किनारे तक घूमने लगे. एक दिन वे सत्यवती के पिता से विवाह की बात करने गए तो उन्होंने शर्त राखी की यदि महाराज सत्यवती के पुत्रो को राजा बनाने का आश्वासन दे तभी विवाह संभव है परंतु महाराज अपने पुत्र के साथ अन्याय नहीं करना चाहते थे अतः वे वह से लौट आये (mahabharat ke pramukh patra ) तथा उदासीन होकर रहने लगे . जब भीष्म को इस बात का पता चला तो उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ले ली . अपनी इसी भीषण प्रतिज्ञा के कारन उनका नाम भीष्म पड़ा .
जब महाराज शांतनु को पता चला तब उन्होंने अपने पुत्र को कोई वरदान मांगने को कहा परंतु भीष्म के मन करने पर उन्होंने स्वयं ही अपने पुत्र भीष्म को इच्छामृत्यु का वरदान दिया .

धृतराष्ट्र
महाराज पाण्डु के बड़े भ्राता तथा कौरवों के पिता महारज धृतराष्ट्र अपने अंधे होने के कारण राजा नहीं बन पाए तथा महारज पाण्डु को हस्तिनापुर का राजा घोसित किया गया परंतु महाराज पाण्डु की मृत्यु के पश्चात धृतराष्ट्र को राज्य की जिम्मेदारी सौपी गयी . महाराज धृतराष्ट्र अपने ज्येष्ठ पुत्र duryodhan के पुत्र मोह में इतने अंधे थे की वे उसके किसी भी गलत कर्म की तरह ध्यान (mahabharat ke pramukh patra ) ही नहीं देते थे . वे दुर्योधन की जिद के कारन हस्तिनापुर के विभाजन को भी स्वीकार कर लेते है . दुर्योधन अपने हर षड़यंत्र को धृतराष्ट्र के पुत्र मोह का लाभ लेकर मनवा leta है . धृतराष्ट्र पुत्र मोह में इतने अंधे हो जाते है की द्युत क्रीड़ा तथा द्रौपदी वस्त्र हरण के समय भी कुछ नहीं बोलते .अंततः धृतराष्ट्र के पुत्र मोह के कारण ही समूचे कुरु वंश का विध्वंश होता है .

वृधाक्ष्त्र
सिंधु राज्य के राजा तथा कौरवों की बहन दुशाला के पति जयद्रथ ने एक बार अपने पिता वृधाक्ष्त्र के पास जाके भीष्म की तरह इच्छामृत्यु का वरदान प्राप्त करने की इच्छा प्रकट करि . इस पर वृधाक्ष्त्र ने (mahabharat ke pramukh patra ) कहा की उनमे इतनी सिद्धि नहीं है की वे उन्हें इच्छामृत्यु का वरदान दे सके . परंतु अपने पुत्र मोह से विवश होकर उन्होंने जयद्रथ को वरदान दिया की जो भी जयद्रथ के मस्तक को भूमि पर गिरायेगा उसके सर में विस्फोट होने के कारन उसकी मृत्यु हो जाएगी .