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शास्त्रों के अनुसार अपने पितरों की आत्मा को शांति देने का सही समय है यह श्राद्ध पक्ष। ऐसा माना जाता है कि इस समय सूर्य दक्षिणायन होता है, जिस कारण आत्माओं की मुक्ति का मार्ग खुल जाता है। और यदि इस दौरान श्राद्ध पाठ किया जाए, तो प्रेत योनि में जूझ रही आत्माओं को मुक्ति दिलवाकर अगले चरण तक पहुंचाया जा सकता है।

लेकिन यह पूजा करने के भी कुछ नियम हैं, जैसे कि श्राद्ध का समय तब होता है जब सूर्य की छाया पैरों पर पड़ने लगे। यानी दोपहर के बाद ही श्राद्ध करना चाहिए। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार सुबह-सुबह या 12 बजे से पहले किया गया श्राद्ध पितरों तक नहीं पहुंचता है।

कहते हैं कि देवताओं से भी पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी होता है। देवकार्य से भी ज्यादा पितृकार्य का महत्व होता है।

विभिन्न धार्मिक ग्रंथ जैसे कि वायु पुराण, मत्स्य पुराण, गरुण पुराण, विष्णु पुराण आदि पुराणों तथा अन्य शास्त्रों जैसे मनुस्मृति में भी श्राद्ध कर्म के महत्व के बारे में बताया गया है।

पूर्णिमा से लेकर अमावस्या के मध्य की अवधि अर्थात पूरे 16 दिनों तक पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिए कार्य किए जाते हैं। पूरे 16 दिन नियमपूर्वक कार्य करने से पितृ-ऋण से मुक्ति मिलती है। इस दौरान ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा दी जाती है।

आम जनमानस में प्रचलित मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पूजा व्यक्ति की मृत्यु तिथि पर ही की जाती है। लेकिन इसके अलावा भी शास्त्रों में अनेक तिथियां हैं, जिन पर श्राद्ध पूजा की जाती है।

उदाहरण के लिए यदि किसी को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो वह लोग अमावस्या तिथि के दिन अपने पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं और पितृदोष की शांति करा सकते हैं।

चलिए अब आपको कुछ ऐसे निर्देशों से परिचित कराते हैं, जिनका श्राद्ध पूजा के दौरान पालन करना अति आवश्यक है।

तैत्तीरीय संहिता के अनुसार पूर्वजों की पूजा हमेशा, दाएं कंधे में जनेऊ डालकर और दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके ही करनी चाहिए।

माना जाता है कि सृष्टि की शुरुआत में दिशाएं देवताओं, मनुष्यों और रुद्रों में बंट गई थीं, इसमें दक्षिण दिशा पितरों के हिस्से में आई थी।

गंगाजल, दूध, शहद, तरस का कपड़ा, दौहित्र, कुश और तिल महत्वपूर्ण हैं। तुलसी से पितृगण प्रलयकाल तक प्रसन्न और संतुष्ट रहते हैं।

। मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णुलोक को चले जाते हैं। श्राद्ध सोने, चांदी कांसे, तांबे के पात्र से या पत्तल के प्रयोग से करना चाहिए।

श्राद्ध पूजा के बाद जब ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए तब भी विशेष निर्देशों का पालन करना जरूरी है। जैसे कि भूलकर भी ब्राह्मणों को लोहे के आसन में भोजन ना कराएं। इसके अलावा केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन कराना भी निषेध है।

अगली बात जो हम बताने जा रहे हैं, वह बात शायद आपने कई बार सुन भी रखी होगी। श्राद्ध पक्ष में मांगलिक कार्य यानी सगाई और शादी से लेकर गृह प्रवेश निषेध है, लेकिन श्राद्ध में खरीदारी अशुभ नहीं शुभ है। इससे पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है।


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