bhagvad gita

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भगवद गीता(bhagavad gita) साक्षात भगवान की वाणी है।यह भगवान श्री कृष्णा और अर्जुन के बीच हुआ दैवीय संवाद है। यह संवाद आज से 5000 वर्ष पूर्व कुरुक्षेत्र नमक स्थान पर हुआ।भगवद गीता मे जीवन के सभी महत्वपूर्व प्रश्नो का उत्तर है- जैसे हम कौन है,भगवान कौन है, हमें कस्ट क्यों होता है। पुर्नःजन्म जन्म क्यों होता है।क्या अन्य ग्रहो पर जीवन है।हम कैसे इस जन्म मे और अगले जन्म मई सुखी रह सकते है।हम कैसे भगवान को जान सकते है। क्या आप जानते है कुरुक्षेत्र मे भगवद गीता कही गयी उसका कारण क्या है।

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5000 साल पहले विचत्रवीर्य नमक राजा का देहांत हो गया। उसका बड़ा पुत्र धृतराट्र जन्म से अँधा होने के कारण राज्यभर संभालने मे असमर्थ था।उसके छोटे भाई पाण्डु ने राज्यभर संभाला।पाण्डु की मृत्यु के बाद उसके पांच पुत्र जो पांडवो के नाम से विख्यात थे । नियमानुसार राज्य के उत्तराधिकारी बने। पांडव अभी बालक ही थे।इसी कारण धृतराट्र ने स्वम राज्य संभाला।

धृतराट्र के 100 पुत्र थे जो कौरवो के नाम से जाने जाते थे।जब पांडव बड़े होकर राज्य संभालने लायक हुए वो सम्पूर्ण राज्य नहीं लेना चाहते थे।अगर नियमसार बात करे तो वो उनका अधिकार था।पांडव सिर्फ अपना हिस्सा चाहते थे।इस प्रकार राज्य को पांडवो और कौरवो मे बाँट दिया गया।परन्तु कौरवो मे श्रेठ दुर्योधन को अपने भाग्य से संतुष्टि नहीं थी। वो संपूर्ण राज्य को स्वंय ही भोगना चाहता था।

धुयोधन ने पांडवो को मरने के लिए काफी षणयंत्र रचे विफल रहे।धुयोधन ने नियम के विरुद्ध सारा राज्य हड़फ लिया।पांडवो को राज्य से निष्काषित कर दिया।उसके बाद पंडयो ने पांच गांव की मांग की धुयोधन ने उत्तर दिया पांच गांव तो दूर वो  एक सुई की नौक के बराबर की जमीन नहीं देगा।

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भगवान श्री कृष्णा ने इस मसले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने का प्रस्ताव रखाधुयोधन ने इस प्रस्ताव को ठुकराते हुए पांडवो के साथ युद्ध की घोषणा कर दीइस प्रकार से महाभारत विश्व युद्ध का आगाज हुआ

दुर्योधन और अर्जुन दोनों भगवान श्री कृष्णा के पास सहायता मांगने गए।भगवान श्री कृष्णा के पास मदद के लिए आये। किसी भी व्यक्ति को नहीं ठुकराते थे।चाहे वो सज्जन हो या दुर्जन। भगवान श्री कृष्णा ने अपनी सेना को एक ओर खुद को दूसरी ओर रखने का प्रस्ताव रखा।दुयोधन ने भगवान श्री कृष्णा की सेना को चुना।

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अर्जुन को भगवान श्री कृष्णा को अपने मार्गदर्शन के रूप मे प्राप्त करने का अवसर मिला। इस प्रकार से अर्जुन को श्री कृष्ण सारथि के रूप मे मिले।युद्ध मे अर्जुन एक दुविधा मे उलझ गया। वो अपने अधिकारों के लिए लड़े उसके आवश्यक था उसके प्रियजनों का वध।दूसरा रास्ता था युद्धभूमि से पलायन कर दुष्ट धुयोधन को राज्य पर शाशन करने दे।

अर्जुन अपने आप को इस दुविधा से बाहर निकलने  मे असमर्थ पाकर भगवन  श्री कृष्णा की शरण लेता है।अपने मित्र एवं भक्त अर्जुन को भगवन श्री कृष्णा गीता के दिव्या उपदेश द्वारा दुविधा से उबरते है।

श्रीमद गीता के माध्यम से भगवन श्री कृष्णा अर्जुन के सामान अपनी शरण मे आए अपने सभी भक्तो को संकट से बाहर  निकलने का रास्ता बताते है।भगवद गीता एक दिव्य साहित्य है ,जिसको ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए।

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यदि कोई श्रीमद भगवत गीता() के उपदेशो का पालन करे। वो जीवन के दुखो और चिंताओं से मुक्त हो सकता है। इंसान अपने दुखो और भय से दूर हो जाता है। वो अपने जीवन को सफल बना सकता है। उसका अगला जीवन आध्यात्मिक होगा।

यदि कोई श्रीमद भगवद गीता को निष्ठा तथा गंभीरता के साथ पढ़ता है। उसके सारे बुरे दुष्कर्मो का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

मनुष्य जल मे स्नान करके अपने आप को साफ़ एवं स्वछ कर सकता है।यदि कोई गंगा रूपी भगवद गीता के ज्ञानसागर मे एक बार स्नान कर ले। वो मनुष्य भवसागर की मलिनता से सदा सदा के लिए मुक्त हो जाता है।

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भगवद गीता भगवान के मुँह से निकली है। इसीलिए किसी को भी अन्य साहित्य पढ़ने की आवश्य्कता नहीं है।उसको केवल ध्यानपूर्वक श्रीमद बागवद गीता का अनुशरण करना चाहिए। वर्तमान युग मे लोग सांसारिक कार्यो मे इतने व्यस्त है की उनके लिए वैदिक साहित्य का अध्यन कर पाना असंभव है।  इसकी आवस्यकता भी नहीं है।केवल हमारे पोस्ट से आप ज्ञान प्राप्त कर सकते है।

हमें श्रीमद गीता का अनुसरण करना चाहिए। इसमें समस्त ज्ञान का भंडार है ओर इसका प्रवचन स्वम भगवान ने किया है।