neem karoli baba-जानियें नीम करोली बाबा के अद्भुत चमत्कार।

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नीम करोली बाबा(neem karoli baba) ने हमें भगवान् से प्यार करने सभी में ईश्वर का ही दर्शन करने की शिक्षा दी है वो नीम करोली बाबा अन्तर्यामी थे हर एक के मन की बात जान जाते थे उसी के अनुसार व्यवहार करते थे महाराज जी की शिक्षा सरल और सार्वभौमिक थी
उत्तर भारत भर में चमत्कारी बाबा के रूप में जाना जाता है उन्होंने कई सिद्धियों को प्रकट किया जैसे कि एक ही समय में दो स्थानों पर होना या भक्तों को उंगली के स्पर्श पर समाधि (भगवान चेतना की स्थिति) में डाल देना
महाराज जी सर्वश्रेष्ठ प्रेम के लिए जाने जाते हैं जो उन्होंने उन सभी पर दिखाया जो उनकी उपस्थिति में आए थे और साथ ही साथ जो शरीर में कभी साक्षात नहीं मिले थे लेकिन उन्होंने उनके साथ सम्बन्ध स्थापित किया है

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इस प्रकार महाराज-जी नीम करोली बाबा (neem karoli baba)के रूप में जाने जाने लगे यह पहले की बात है शायद जब महाराज जी बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में या तीसरे दशक की शुरुआत में थे कई दिनों तक किसी ने उन्हें खाना नहीं दिया था और भूख ने उन्हें निकटतम शहर के लिए ट्रेन में जाने के लिए प्रेरित किया था जब कंडक्टर ने महाराज जी को टिकट के बिना प्रथम श्रेणी के कोच में बैठे देखा तो उन्होंने आपातकालीन ब्रेक और ट्रेन को रोक दिया कुछ मौखिक बहस के बाद महाराज जी को अनजाने में ट्रेन छोड़नी पड़ी । यह ट्रेन नेब करौरी के गांव के पास रुक गई थी जहां महाराज-जी रह रहे थे

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महाराज जी एक पेड़ की छाया के नीचे बैठे थे, जबकि कंडक्टर ने अपनी सीटी बजाई  और इंजीनियर ने ट्रेन थ्रॉटल खोला। लेकिन ट्रेन नहीं चली । कुछ समय के लिए ट्रेन वहां रुक गई, जबकि हर प्रयास इसे स्थानांतरित करने के लिए किया गया था। एक और इंजन इसे धक्का देने के लिए बुलाया गया था, लेकिन सभी का कोई फायदा नहीं हुआ। एक स्थानीय मजिस्ट्रेट, जो महाराज जी के बारे में जानता था, ने अधिकारियों को सुझाव दिया कि वे उस युवा साधु को ट्रेन में वापस ले जाएं। शुरुआत में अधिकारी इस तरह के अंधविश्वास से चिंतित थे, लेकिन ट्रेन को स्थानांतरित करने के कई निराशाजनक प्रयासों के बाद उन्होंने इसे एक कोशिश देने का फैसला किया।

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कई यात्रियों और रेलवे अधिकारियों ने महाराज जी से संपर्क किया, उन्हें भोजन और मिठाई उनके साथ चढ़ाने के रूप में ले जाया गया। उन्होंने अनुरोध किया कि वह ट्रेन में जाएं। वह दो स्थितियों पर सहमत हुए रेलवे अधिकारियों को नेब करोरी गांव के लिए एक स्टेशन बनाने का वादा करना चाहिए (उस समय ग्रामीणों को निकटतम स्टेशन पर कई मील चलना पड़ता था), और रेल मार्ग को अब साधु साधुओं की देखभाल करनी चाहिए । अधिकारियों ने वादा किया कि जो कुछ भी उनकी शक्ति में था, और महाराज जी ने आखिरकार ट्रेन में फिर से प्रवेश किया। तब उन्होंने ट्रेन शुरू करने के लिए महाराज जी से पूछा। वह बहुत अपमानजनक हो गया और कहा, “ट्रेनों को शुरू करने के लिए मेरे पास क्या है?” इंजीनियर ने ट्रेन शुरू की, ट्रेन ने कुछ गज की यात्रा की, और फिर इंजीनियर ने इसे रोक दिया और कहा, “जब तक साधु मुझे आदेश नहीं देते, हम आगे नहीं बढ़ेंगे। “महाराज जी ने कहा,” उसे जाने दो। “और वे आगे बढ़े। तब महाराज जी ने कहा कि अधिकारियों ने अपना वचन रखा, और जल्द ही नेब करोरी में एक रेलवे स्टेशन बनाया गया और आने जाने वाले साधुओँ की बेहतर तरीके से व्यवस्था होने लगी ।

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इस प्रकार उनका नाम नीम्ब करोली बाबा (neem karoli baba)पड़ा हम यहाँ उनके अनुभवों और उनके भक्तों द्वारा किये गए अनुभवों को प्रस्तुत करने का प्रयास करने जा रहे है जिसके माध्यम से इस कलियुग में समाज में मनुष्यों को जीवन जीने की एक नया आयाम मिलेगाहम उनके भक्तों और उनके अनुयाइयों को  यहाँ प्रस्तुत कर सकने में असमर्थ हैं क्योकि जितनों के बारे में उल्लेखित किया जाए उतना काम ही होगा क्यकि यहाँ एक नहि दो नहीं असंख्य भक्त हैं जिन्होंने उनका सानिध्य प्राप्त किआ है और अपने अनुभवून को प्रस्तुत किआ है हम उन सभी को कोटि सह धन्यवाद देते है

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महाराजजी बिहारी जी के मन्दिर के पीछे एक घर में जाकर रोटी माँगने लगे । बाहर सड़क पर एक साधू भी चिल्लाकर रोटी माँग रहा था – सिर्फ़ एक रोटी । महाराजजी ने उसे अन्दर बुलाया । वे एक ऐसा साधू था जो केवल एक दिन में केवल दो ही रोटी माँगता था । बाबा उससे बोले,” तुम्हारी रोटी कहाँ है ?”और उससे लेकर उसकी एक रोटी ख़ाली बाबा ने । बाबा ने बाद में बताया कि वे आदमी ईराक़ का रहने वाला है । चालीस साल पहले वृन्दावन आ गया था । परन्तु वहाँ पर जो भक्त उपस्थित थे उन्हें वे व्यक्ति इस संसार का नहीं लगा । जाने भगवान भी कौन कौन से रूप बदल कर बाबा से मिलने आते थे ।

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कैची में बाबा अंक दिन शंकर प्रसाद व्यास जी के साथ टहल रहे थे । बाबा व्यास जी के कन्धे पर हाथ रख कर चल रहे थे । एकाएक व्यास जी के मन में विचार आया कि लोग बाबा को हनूमान का अवतार कहते है , पर इस बात पर विश्वास कैसे किया जाये ।अभी वे सोच ही रहे थे कि बाबा का कंधे पर रखा हाथँ उनको भारी महसू स होने लगा और धीरे धीरे उसका भार बड़ता ही चला गया । यहाँ तक कि उनका कंधा जवाब देने लगा । हाथ सहज रूप से आपके कन्धे पर पड़ा था उसका आकार भी यथावत था । व्यास जी बहूत परेशान हो गये । प्रेम से रखे इस महान विंभूति के हाथ को हटाने में आपके संकोच हो रहा था , पर उसका भार बड़ता जा रहा था जो आपके सहन से बाहर था । अपनी ऐसी वि वशता में आप न ही मन प्रार्थना करने लगे कि बाबा मूझे मेरी धृष्टता के लिये क्षमा करे । ऐसे कहते ही स्थिति पूर्ववत हो गयी । इस तरह बाबा ने अपना हनूमत रूप दिखा दिया ।

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ध्यान को बाबा अवश्य महत्वपूर्ण बताते थे ! पर जब कोई व्यक्ति उनके पास बैठ कर ध्यान लगाता तोववे तुरंत उसके ध्यान को तोड देते ! लोग उनके पाद-पधो को हाथ मे लेकर ध्यान लगाने की चेष्टा करते को कभी बाबा अपना पैर हटा लेते ! कभी वे कोई प्रशन कर देते ! बाबा सब की क्षमता को जानते थे ! इसी सदर्भ एक बार बाबा बोले , “” मस्तिषक की सीमा होती है! तुम शरीरस्थ हो ! ये चीजे धीरे धीरे प्राप्त करने की है , ऐसा न करने से पागल भी हो सकते है ! यब सत्य हैै कि एकाग्र मन ही अन्तदृष्टि प्रदान करता है और यही आत्म- दर्शन है ! पर ईश्वर स्मरण और लोगो की सेवा करने वालो को ध्यान और पूजा की आवशकता नही है !

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छोटे से छोटे , बड़े से बड़ा रूप धारणा बाबा जी के लिये कोई नई बात नहीं थी । भक्त दर्शनों के इन्तज़ार करते रह जाते और बाबा जी बन्द कमरे से ग़ायब हो जाते । वायू से तीव्र बाबा जी की गति थी । एक समय में वे कई जगह अलग अलग भक्तों के साथ पाये जाते । जैसे एक ही वक़्त में आपके साथ भी और मेरे साथ भी । जैसे मेरे लिखने में मेरे साथ , आपके पढ़ने में आप के साथ पढ़ रहे है । हमारा हर कार्य उनकी ईच्छा के अधीन होता है । हमारे दिमाग में क्या चल रहा है वे सब जानते है । हर दिमाग़ की कूंजी बाबा के हाथ है जब चाहे जहाँ घूमा दे

नीम करौली बाबा

अलौकिक सन्त परम पूज्य श्री नीम करोरी बाबा(neem karoli baba) जीके सानिध्य में जब से होश संभाला है तब से हूँ।मेरे परदादाश्री स्व0 चुन्नी लाल (भगत जी घी वाले) ने सदैव बाबा महाराज जी और सिद्धी माँ की निःस्वार्थ भाव से सेवा की थी।बाबा महाराज जी उन्हेंचुन्नाकहकर सम्बोधित करते थे।जब भी वह वृन्दावन या कैंची आश्रम में होते थे तो महाराज जी उन्हें रसोई की जिम्मेदारी सौंप देते थे और महाराज जी को परदादाश्री के हाथों की चाय बहुत पसन्द थी। वे और सिद्धी माँ को उनकी हाथों की बनी हुई चाय बहुत पसन्द थी। क्योंकि वह चाय काली मिर्च, लोंग, अदरक, तुलसी के पत्ते, काला नमक आदि के मिश्रण से बनाते थे जो कि स्वादिष्ट बनती थी। वृन्दावन आश्रम में सिद्धी माँ के कमरे में सिर्फ़ परदादाश्री को जाने की ईजाजत थी। सिद्धी माँ उनके जीवन से सम्बम्धित महाराज जी के साथ बिताये हुए उन स्वर्ण पलों को बताती हैं। स्व0 श्री चुन्नी लाल (भगत जी घी वाले), स्व0 श्री विश्म्भर दयाल (सहपऊ वाले), स्व0 श्री होंदा राम जी आदि महाराज जी के सेवादारों मे से महाराज जी के अत्यन्त प्रिय रहे हैं।ये सभी अलीगढ़ (उत्तरप्रदेश) जिले से हैं।

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इनके सम्बन्ध में स्वयं छोटेबाबू जी (बाबा महाराज जी के छोटे पुत्र), सिद्धी माँ, श्री जीवन दा, श्री गुरू दत्त शर्मा जी आदि जो महाराज जी के उस समय के भक्तों से जानकारी प्राप्त हो सकती है।महाराज जी के महाप्रयाण के पश्यात् वृन्दावन में प्रत्येक साल (अनन्तचतुर्दशी) के दिन महाभोज होता है। जिसमें देशविदेशों से महाराज जी के भक्त प्रसाद प्राप्त करने आतें हैं। बहुत ही कम लोग जानते है कि महाभोज के अगले दिन कढीचावल का प्रसाद वितरित होता है। ऐसा इसलिये होता है कि भण्डारा के अगले दिन बहुत सारा दही बच गया था। जो कि खट्टा हो चला था। इसी को चलते स्व0 चुन्नी लाल (भगत जी घी वाले) ने कढी बनाने के लिये कह दिया। उसी समय से (अनन्तचतुर्दशी) के अगले दिन से कढीचावल का प्रचलन शुरू हो गया। स्व0 श्री विश्म्भर दयाल जी तो साक्षात महाराज जी की घण्टों आरती किया करते थे।कभीकभी महाराज जी लताड दिया करते थे।

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आज जो वृन्दावन आश्रम में अनन्तचतुर्दशी वाले दिन महाराज जी की कुटिया में जो महाराज जी की तस्वीर को सजाते हैं वह कार्य स्व0 श्री विश्म्भर दयाल जी के पुत्रों द्वारा किया जाता है ठीक इसी प्रकार से स्व0 श्री विश्म्भर दयाल जी महाराज जी की चाँदी के वर्खों, चन्दन, रोली, चावल आदि से पूजा करते थे।

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महाराज जी का अलीगढ़ से भी सम्बन्ध बहुत गहरा रहा है। महाराज जी ने अपने समय में अलीगढ़ शहर के प्रसिद्ध स्थानों पर सदैव आते रहे जिनमें पँचमुखी भूतेश्वर मन्दिर, श्री खेरेश्वर मन्दिर, आदि प्रमुख रहे हैं। मैं परिवार के सभी सदस्यों से महाराज जी की लीलाओं के बारे में सदैव कुछ कुछ नया सुनता रहता हूँ। महाराज जी की कई ऐसी लीलाये है शायद आपने नहीं सुनी होगी जैसे वृन्दावन में श्री हनुमान जी की मूर्ती स्थापना के समय महाराज जी का एक ही दिन एक ही समय पर अलगअलग दो स्थानों मे होना, श्री हनुमान जी की खण्डित मूर्ति की स्थापना करवाना आदि। जिन्हें समय के साथ-2 आपके सामने प्रेषित करता रहूँगा।