vaishno devi story in hindi

माता वैष्णो के तीन पिंडियो के इस अलौकिकी रहस्य को जान आप भी हो जाओगे हैरान !

vaishno devi story in hindi-माता वैष्णो के अलौकिकी रहस्य

”आदिशक्ति” वैष्णो देवी माता का मंदिर हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध मंदिरो में से एक है. माता वैष्णो के प्रति उनके भक्तो की अटूट प्रेम एवं श्रद्धा है|आज हम आपको jai maa vaishno devi  के बारे मे बताने जा रहे है| तभी तो वे पर्वतो के गोद में बसी माता वैष्णो देवी के मंदिर के दर्शन के लिए कठिन परिश्रम करके उनके दरबार तक पहुचते है| vaishno devi story in hindi नवरात्रो के समय तो माता विष्णो देवी के मंदिर में चार चाँद लग जाते है|

नवरात्रो के समय तो माता विष्णो देवी के मंदिर में चार चाँद लग जाते है उन दिनों यहां की भव्यता देखते ही बनती है. इन नौ दिनों में माता के इस मंदिर को एक उत्सव का रूप मिल जाता है तथा यहां देश विदेश से भक्तो का जमावड़ा देखने को मिलता है.

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यहां यह मान्यता प्रचलित है की जो भी भक्त इस मंदिर में सच्चे दिल से माता के दर्शन  ( vaishno devi story in hindi) करने को आता है, माता उसकी सभी मनोकामनाये पूर्ण करती है इसी के साथ अन्य मान्यता यह भी है की अगर माता न चाहे तो कोई भी माता के दरबार में हाजिरी नहीं लगा सकता.

जब माता की इच्छा होती है तो उनका भक्त किसी न किसी बहाने से उनके पास खिंचा चला आता है. माता निर्बलों का बल, नेत्रहीनों को नेत्र, सन्तान हिनो को सन्तान एवं गरीबो को धन प्रदान करती है.

माता के इस चमत्कारी प्रभाव के साथ इस धार्मिक स्थल की प्रत्येक बात कुछ बयां करती है. ना केवल यह स्थल, वरन् आदिशक्ति से जुड़ी पौराणिक कथा, इस मंदिर की संरचना का कारण एवं मंदिर में रखी तीन पिंडियां सभी का रहस्य बेहद रोचक है.

how to plan for mata vaishno devi

vaishno devi story in hindi भारत का स्वर्ग कहे जाने वाले सबसे खूबसूरत एवं रमणीय स्थल जम्मू कश्मीर के उधमपुर जिले में कटरा से 12 किलो मीटर की दुरी पर स्थित है माता वैष्णो देवी का मंदिर. जिस पहाड़ी पर माता वैष्णो का मंदिर स्थित है उस पहाड़ी को भी विष्णो देवी पहाड़ी के नाम  से जाना जाता है.

सुन्दर वादियो में बसे  माता वैष्णो देवी के इस मंदिर में  पहुचने के लिए कठिन मार्गो एवं चढ़ाइयों का सामना करना पड़ता है. परन्तु भक्त माता पर श्रद्धा एवं आस्था होने के कारण अपनी इस यात्रा को सफल बनाते है था उन्हें उस कठिन मार्ग एवं चढाई का कुछ ध्यान नहीं रहता.

माता से जुड़ी एक पौराणिक कथा-vaishno devi story in hindi

माता से जुड़ी एक पौराणिक कथा काफी प्रसिद्ध है जो माता के एक भक्त श्रीधर से जुड़ी है. इस कथा के अनुसार वर्तमान कटरा क़स्बे से 2 कि.मी. की दूरी पर स्थित हंसाली गांव में मां वैष्णवी के परम भक्त श्रीधर रहते थे, जो कि नि:संतान थे.  संतान ना होने का दुख उन्हें पल-पल सताता था.

इसलिए एक दिन नवरात्रि पूजन के लिए कुंवारी कन्याओं को बुलवाया. अपने भक्त को आशीर्वाद देने के लिए मां वैष्णो भी कन्या वेश में उन्हीं के बीच आ बैठीं. पूजन के बाद सभी कन्याएं तो चली गईं पर मां वैष्णों देवी वहीं रहीं और श्रीधर से बोलीं, “सबको अपने घर भंडारे का निमंत्रण दे आओ.”

श्रीधर पहले तो कुछ दुविधा में पड़ गए. एक गरीब इंसान इतने बड़े गांव को भोजन कैसे खिला सकता था. लेकिन कन्या के आश्वासन पर उसने आसपास के गांवों में भंडारे का संदेश पहुंचा दिया.

साथ ही वापस आते समय बीच रास्ते में श्रीधर ने गुरु गोरखनाथ व उनके शिष्य बाबा भैरवनाथ को भी भोजन का निमंत्रण दे दिया.

श्रीधर के इस निमंत्रण से सभी गांव वाले अचंभित थे, वे समझ नहीं पा रहे थे कि वह कौन सी कन्या है जो इतने सारे लोगों को भोजन करवाना चाहती है? लेकिन निमंत्रण के अनुसार सभी एक-एक करके श्रीधर के घर में एकत्रित हुए.

तब कन्या के स्वरूप में वहां मौजूद मां वैष्णो देवी  ने एक विचित्र पात्र से सभी को भोजन परोसना शुरू किया.

भोजन परोसते समय जब वह कन्या भैरवनाथ के समीप गई तो उन्होंने वैष्णव भोजन की जगह मास भक्षण की इच्छा जताई. माता ने जब उन्हें समझाने की कोशिश करि तो वे नहीं माने तथा उन्होंने कन्या का हाथ पकड़ लिया.

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jai maa vaishno devi

 

माता रूपी वह कन्या भैरवनाथ के कपट को जान गयी तथा अपना हाथ छुड़ाते हुए वे त्रिकुटा पर्वत की ओर भागते हुए पहुची.

भैरवनाथ भी उनके पीछे गए. कहते हैं जब मां पहाड़ी की एक गुफा के पास पहुंचीं तो उन्होंने हनुमानजी को बुलाया और उनसे कहा कि मैं इस गुफा में नौ माह तक तप करूंगी, तब तक आप भैरवनाथ के साथ खेलें. आज्ञानुसार इस गुफा के बाहर माता की रक्षा के लिए हनुमानजी ने भैरवनाथ के साथ नौ माह खेले.

आज के समय में इस पवित्र गुफा को ‘अर्धक्वाँरी’ के नाम से जाना जाता है.

कहते है की उस दौरान हनुमान जी को प्यास लगी तब देवी ने अपने बाण चलाकर एक पानी की धारा उतपन्न की तथा उसी से अपने केश भी धोये. आज वह धारा बाणधारा के नाम से यहां प्रसिद्ध है.

कथा के अनुसार जब हनुमान जी भैरवनाथ के साथ युद्ध कर थक गए तब स्वयं माता ने काली का रूप धार भैरवनाथ के साथ युद्ध किया तथा उनका संहार किया. भैरवनाथ का सर कट कर भवन से 8 किलोमीटर दूर त्रिकुट पर्वत के भैरव घाटी में जाकर गिरा. उस स्थान भैरवनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है.

कहते की भैरवनाथ के क्षमा मागने पर माता ने उन्हें उच्च स्थान प्रदान किया  तथा उनका मंदिर स्थापित कर उन्हें वरदान दिया की जो कोई भी भक्त यह मेरे दर्शन करने आएगा वह मेरे दर्शन के बाद तुम्हारे मंदिर में भी अवश्य आएगा अन्यथा उसकी पूजा अपूर्ण मानी जाएगी.

इसी कारण आज भी जो कोई भक्त (jai maa vaishno devi) माता के दर्शन  करने आता है वह माता के दर्शन के बाद अवश्य भैरव नाथ के भी दर्शन करता है. उधर श्रीधर भी अधीर हो गए तब उन्हें माता एवं उनके तीन पिंडियो के दर्शन हुए जिनकी खोज करते हुए वह पहाड़ी पर पहुचे.

 

पिंडिया मिलने पर श्रीधर ने उनकी विधि पूर्वक पूजा की तथा इसके पश्चात साक्षात् माता ने उन्हें दर्शन दिया. तब से श्रीधर के बाद उनके वंशज माता की पूजा करते हुए आ रहे है. माता के इन तीनो पिंडो का चमत्कारी प्रभाव भी रोचक है यह आदिशक्ति के तीन रूप माने जाते है.

पहली पिंडी देवी सरस्वती है जो ज्ञान एवं विद्या की देवी है. दूसरी पिंडी देवी लक्ष्मी है जो धन एवं वैभव की देवी व तीसरी पिंडी देवी काली जो शक्ति का रूप है. इन तीन पिंडियो का मनुष्य के जीवन से गहरा रिश्ता है.

जीवन को सफल बनाने के लिए विद्या, धन और बल तीनों ही जरूरी होते हैं, इसलिए इन्हें हासिल करने के लिए भक्त कठोर परिश्रम कर, पहाड़ियों की यात्रा पूर्ण करता हुआ माता के दरबार  में पहुंचता है. जो जितने उत्साह से इस यात्रा को पूरा करता है, माता का आशीर्वाद उतना ही उस पर बढ़ता चला जाता है.